(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

शान्तिपर्व (Mahabharat) - 12. शान्तिपर्व(महाभारत)


॥ श्रीः ॥
12.147. अध्यायः 147
Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Topics
भर्तृशोकतप्तथा कपोत्या सकरुणं विलप्याग्नौ प्रवेशः॥ 1॥ ततो विमानारोहणेन स्वर्गतयोः कपोतयोस्तत्र सुखेन चिरविहारः॥ 2॥


Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Text

भीष्म उवाच। 12-147-0x(5787)(70879)
ततो गतो शाकुनिके कपोती प्राह दुःखिता।
संस्मृत्य सा च भर्तारं रुदती शोककर्शिता॥ 12-147-1(70880)
नाहं ते विप्रियं कान्त कदाचिदपि संस्मरे।
सर्वाऽपि विधवा नारी बहुपुत्राऽपि शोचते॥ 12-147-2(70881)
शोच्या भवति बन्धूनां पतिहीना तपस्विनी।
लालिताऽहं त्वया नित्यं बहुमानाच्च पूजिता॥ 12-147-3(70882)
वचनैर्मधुरैः स्निग्धैरसंक्लिष्टमनोहरैः।
कन्दरेषु च शैलानां नदीनां निर्झरेषु च॥ 12-147-4(70883)
द्रुमाग्रेषु च रम्येषु रमिताऽहं त्वया सह।
आकाशगमने चैव विहृताऽहं त्वया सुखम्।
रमामि स्म पुरा कान्त तन्मे नास्त्यद्य मे प्रिय॥ 12-147-5(70884)
मितं ददाति हि पिता मितं भ्राता मितं सुतः।
अमितस्य हि दातारं भर्तारं का न पूजयेत्॥ 12-147-6(70885)
नास्ति भर्तृसमो नाथो नास्ति भर्तृसमं सुखम्।
विसृज्य धनसर्वस्वं भर्ता वै शरणं स्त्रियाः॥ 12-147-7(70886)
न कार्यमिह मे नाथ जीवितेन त्वया विना।
पतिहीना तु का नारी सती जीवितुमुत्सहेत्॥ 12-147-8(70887)
एवं विलप्य बहुधा करुणं सा सुदुःखिता।
पतिव्रता संप्रदीप्तं प्रविवेश हुताशनम्॥ 12-147-9(70888)
ततश्चित्राङ्गदधरं भर्तारं साऽन्वपद्यत।
विमानस्थं सुकृतिभिः पूज्यमानं महात्मभिः॥ 12-147-10(70889)
चित्रमाल्याम्बरधरं सर्वाभरणभूषितम्॥
विमानशतकोटीभिरावृतं पुण्यकर्मभिः॥ 12-147-11(70890)
ततः स्वर्गं गतः पक्षी विमानवरमास्थितः।
कर्मणा पूजितस्तत्र रेमे स सह भार्यया॥ ॥ 12-147-12(70891)

इति श्रीमन्महाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि सप्तचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः॥ 147॥


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